पूरा बरसात बिना मछली के कौर नहीं उठता था


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मूसलाधार बारिश हो रही थी । रह-रह कर बिजली कड़क जाती । यह आषाढ़ की पहली झमटगर वर्षा थी । मैं बिस्तर पर लेटे-लेटे सुबह होने का इंतजार कर रहा था क्योंकि यह अपने तरह की विशेष सुबह लाता । सभी नदी-नाले, चौर – चांचड़ इससे भर जाते । यहाँ से हम लोग बरसात की शुरुआत मानते थे । अगली सुबह से मछली पकड़ने का एक नया व्यवसाय सबों को अपनी गिरफ्त में ले लेता था । जिधर देखो उधर सभी मछली मारने के उपक्रमों में दिखते । इस बार मैं चुकना नहीं चाहता था । रात काटे नहीं कट रही थी । ऐसे ही समय के लिए मैंने ट्यूशन से बनाए पैसों से एक “अंता” खरीद रखा था । उस समय ट्यूशन पढ़ाना एक फैशन था । सभी पढ़ाते थे । लोग ग्यारहवीं में गए नहीं कि मैट्रिक को ट्यूशन पढ़ाने लगे । अभिभावकों पर निर्भरता कम ही थी । हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा । खैर….. “अंता के जीभिया” को आजमाने का समय आ गया था । ये वैसी वर्षा चल रही थी जिससे चौर को उलट जाने की पूरी संभावना थी । सभी जल क्षेत्र सहबंधन से जुड़ जाते । जिससे मछलियाँ पूरे बाध में छितरा जाती । मछली में दिलचस्पी रखने वाले सभी ऐसी पहली वर्षा का इंतजार करते थे । अभी सुबह के साढ़े तीन ही हुए थे । पर मुझसे बिस्तर पर पड़े रहा नहीं जा रहा था ।

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मैं एक टार्च ओर कुदाल लेकर घर के पिछवाड़े गया । देखा खेतों से पानी एक धारा बनाकर पोखर में गिरते जा रहे हैं और पोखर का तल उपड़ उठता जा रहा है । मैंने धार को टार्च की रौशनी में ध्यानपूर्वक देखना शुरू किया । मुझे धार के उल्टा चढ़ते हुए “सिंघिन” मछली दिखी । दिल बाग-बाग हो गया । ये बस आज का ही खेला – बेला था । शाम होते – होते सभी सरपट हो जाना था । मै जल्दी-जल्दी कुदाल से ऊँची एवं मजबूत मेड़ बनाना शुरू किया। वर्षा भी मुझे रोक नहीं सकी। एक उमंग था जल्दी से जल्दी “अंता” लगा लेने का और अधिक से अधिक मछली पकड़ने का। मछलियाँ आँखों के सामने से भागी जा रही थी । तकरीबन एक धंटे में मैंने टार्च की रौशनी में सफलतापूर्वक पोखर की ओर मुँह करके अंता को लगा दिया था और घास-फूस से उसे सुरक्षित और सुसज्जित कर दिया था । धार भी पूरे “अंता” से होकर गुजर रहा था । काम खत्म ।

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मैं वापस अपने रूम में आकर कपड़े बदले । धीरे-धीरे बुनछेक होने लगा था और सुबह का उजाला अपना अस्तित्व कायम करने को प्रयासरत हो चला था । मैं भी एक लाठी और गमछे को उठा ब्रह्मोत्तर की तरफ चल दिया । अभी खेत में उतरने को सोंच ही रहा था कि बिल्कुल किनारे उस झलफले में ” सुंह” पानी में हिलता- डुलता नजर आया । कौन सी मछली है नहीं पहचान सका । लेकिन तबतक शायद मछली ने भी मुझे देख लिया । पीछे की ओर उलटी । उसकी विशालता का अनुभव हुआ। अपना शिकार कौन छोड़ता है भला । आगे-आगे मछली पीछे-पीछे सधे कदमों से मैं । लेकिन वह मेरी पहुँच से आगे चल रही था । मेरी आँखें उसपर जमीं थी । उजाला इतना फैल चुका था कि खेतों के ठेहुने भर पानी में मछली पूरी तरह दिख रही थी पर पहचानी ना जा रही थी । आकाश में काले बादल इतने नीचे लग रहे थे मानों हाथ उठाकर पकड़े जा सके । एक बार तो लगा मछली हाथ ना आएगी। अवसर नहीं मिल रहा था । तभी मछली आगे वाले मुंगौटी भरे खेत में उसने प्रवेश किया । उसकी गति कुछ धीमी पड़ी । मैं दो धाप में ही उसके पास पहुँच गया और समधान कर मछली पर लाठी का प्रहार किया । मछली चोट खाकर पानी के उपड़ उछली । मैं लपका । परंतु मेरे हाथ से फिसलकर वही इधर-उधर हो गई । ठीक उसी समय झीसी भी शुरू हो गई । मैं पानी से उठा । गहरी निराशा हुई । शायद शिकार अब ना हाथ आए । तभी बायीं तरफ कुछ हलचल सी लगी । मैं अंदाजे से ही जबरदस्त लाठी का प्रहार किया और उस जगह पर लोट गया । पता नहीं कैसे दाहिने हाथ में उसकी गर्दन आ गई । मैं उसे तली में दबाए-दबाए दूसरे हाथ से भी उसकी गर्दन को जकड़ा । फिर थोड़ी देर बाद संतुलित होकर उसे उठाया । भर जाँघ की “बोआरी” । स्वयं अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था । मछली फिर फरफरायी । छुटते – छुटते बची । कलेजा बुरी तरह खुशी से धड़क रहा था। पानी के बीच भारी मशक्कत से मछली को गमछे में लपेट पाया । लाठी वहीं छोड़ मैं धीरे – धीरे जब गाछी में पहुँचा तो मेरा पोर-पोर विजेता भाव से भरा था । मैं पहले उसे अनावृत किया फिर गर्दन पकड़ के लाने लगा, जिससे अधिक से अधिक लोग देख सकें । मद ने मेरी चाल को धीमा कर दिया था । जिसने भी देखा उसका मूँह खुला का खुला रह गया । लोग उसके वजन का अंदाजा लगा रहे थे । जिसने भी देखा वे सभी ऐसे ही शिकार की आशा में लाठी, दोक्कन लेकर बाध में पिल गए । मैं मछली लेकर घर की ओर आया कि दरवाजे पर ही सबों ने घेर लिया और प्रश्नों की बौछार कर दी । इस हुलमालि ने पिताजी को भी जगा दिया । पिताजी ने हुक्म दनदना दिया – ” मछली को खड़का (मेरी बहन का ससुराल) पहुँचा आओ । अभी झा जी भी आए हुए हैं ।” मुझपर तुषारापात हो गया ।

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मैं आँगन में माँ के पास पहुँचा । पिताजी के हिटलरी फरमान की प्रतिक्रिया सदैव माँ को ही झेलनी पड़ती थी । ये मछली कैसे दिया जा सकता है । ऐसा सेसर मछली मैंने कभी नहीं मारा था । मैं नाक-भौं धुन रहा था । पर कुछ किया नहीं जा सकता था । माँ ने मेरे” अंता” में हो रही हलचलों के विषय में बताया जो पिछले बालकनी से दिखाई देता था । मैं बुझे मन से एक झोला लिए पिछवाड़े “अंता” झाड़ने आ गया । सही से घासों को हटाते हुए “अंता” को पानी से उपड़ उठाया । निछक्का “सिंघिन” एवं “गैंचा” पूरे “अंता” में भरा हुआ था । एक बार फिर से मजा आ गया । सभी को झोला में उलटा । मैं “अंता” को सही से लगाने के बाद खेत एवं पोखर के पानी के तल के अंतर का जायजा लिया । शाम तक जरूर धार चलेगा यानि शाम तक मछली के आसार हैं । अब पिताजी का फरमान उतना कठोर नहीं लग रहा था । वापस आकर मछली माँ को पकड़ते हुए झटपट बहन के यहाँ जाने की तैयारी कर लिया ।

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वहाँ पहुंचकर देखा तो अभी सब ठीक से जगे भी नहीं थे । मैं अपने बहन के हाथ में वह झोला पकड़ाया । झोला से मछली निकलते ही सभी हर्षघोष करने लगे । मैंने अपनी भगिनी और मछली को मापा । मछली बीस ठहरी । सबों को मुझपर विशेष प्यार आने लगा । इससे बढ़िया “सनेश” और क्या हो सकता था भला । फिर वही सवालों की बौछार । धड़ाधड़ मछली का खंड बनाया जाने लगा। मछही हाॅसू से जब बात ना बनी तो टेंगारी प्रयोग में लाया जा रहा था । मशाला पिसाने लगा । सभी मुझपर खाकर जाने का दबाव बनाने लगे । लेकिन मेरा ध्यान तो अपने “अंता” पर लगा हुआ था । मैं चाय पीकर झटपट वापस लौट आया ।

शाम होते-होते कोई भी घर ऐसा नहीं बचा जहाँ से मछली बनने की सुगंध ना उठती हो । मतलब अधिकता ने समता स्थापित कर दी ।

सच मानो पूरा बरसात बिना मछली के कौर नहीं उठता था ।


लेखक : निशिकांत ठाकुर 

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